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महामारी से जूझते विवेकानंद

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महामारी से जूझते विवेकानंद


महामारी से जूझते विवेकानंद

मित्रो ! प्रायः हम सभी स्वामी विवेकानंद जी को एक प्रखर वक्ता और आध्यात्मिक व्यक्तित्व के रूप में जानते हैं ।  परंतु वे अत्यंत करुणावान और सेवाधर्मी भी थे । उनके इस व्यक्तित्व पर बहुत कम चर्चा हुई है। इस लेख में मैं आपके सामने ऐसे कुछ प्रसंग रखना चाहता हूँ जिसमें उनकी करुणापूर्ण मानवसेवा का परिचय मिलता है । बात मार्च 1898 की है । उन दिनों स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य लाभ के लिए दार्जिलिंग गए हुए थे । अत्यधिक श्रम के कारण उनका शरीर बुरी तरह टूट चुका था । इसलिए चिकित्सकों ने उन्हें संपूर्ण विश्राम की सलाह दी थी । परंतु अप्रैल 1898 आते-आते कोलकाता में फैले प्लेग ने ऐसा विकराल रूप धारण कर लिया  कि विवेकानंद पीड़ा से कराह उठे । उनका आराम हराम हो गया । वे वापस कोलकाता लौटने के लिए बेचैन हो उठे। उन्होंने 21 अप्रैल 1898 को जोसेफीन मैक्लाउड को पत्र में लिखा --"मैंने निश्चय किया है कि जिस नगर में मैंने जन्म लिया है वहाँ के प्लेगपीड़ित लोगों की सेवा में मैं अपना जीवन समर्पित कर दूँगा। निर्वाण प्राप्ति का यही सर्वश्रेष्ठ उपाय होगा ।"

 

स्वामी विवेकानंद जी

स्वामी विवेकानंद जी

 

 

 

मई 1898 में विवेकानंद कोलकाता लौट आए ।  कोलकाता के लोग प्लेग के भय से कोलकाता छोड़ छोड़ कर भाग रहे थे । स्वामी जी ने अनुभव किया कि लोग प्लेग से उतने पीड़ित नहीं हैं जितने कि उसके भय से । वे समस्या को समझ गए । उन्होंने कोलकाता की भयभीत जनता को समझाने का बीड़ा उठाया । उन्होंने एक घोषणापत्र छपवाया -- प्लेग मेनीफेस्टो। यह मेनिफेस्टो बंगाली भाषा के साथ-साथ हिंदी भाषा में भी तैयार कराया गया । स्वामी विवेकानंद ने लिखा कि भय से मुक्त रहें। क्योंकि भय सबसे बड़ा पाप है । मन को हमेशा प्रसन्न रखें ।स्वस्थ, स्वच्छ और शुद्ध जीवन जिएँ।  अपने घर , परिसर , कमरे कपड़े , बिस्तर और नालियों को भी स्वच्छ रखें । बासी भोजन बिल्कुल न करें । इसकी बजाय ताजा और पौष्टिक भोजन करें । महामारी की अवधि के दौरान क्रोध और वासना से दूर रहें । भले ही आप गृहस्थ हों । अफवाहों से बिल्कुल न घबराएँ।

विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की ओर से एक प्लेग निवारण समिति का गठन किया । भगिनी निवेदिता को समिति का सचिव नियुक्त किया गया तथा स्वामी सदानंद  उस समिति के पर्यवेक्षक नियुक्त हुए । स्वामी विद्यानंद, परमानंद, शिवानंद उस समिति के सदस्य बने । अब समिति ने प्लेग से राहत दिलाने का कार्य आरंभ किया । पहले शमबाजार , आलमबाजार और आसपास की बस्तियों  की सफाई शुरू की गई। समिति के सदस्य स्वीपर लड़कों के साथ सफाई करने के अभियान में जुट गए । भगिनी निवेदिता और स्वामी विवेकानंद जी ने प्लेग पर व्याख्यान दिया और छात्रों को आगे बढ़कर सेवा कार्य करने के लिए प्रेरित किया ।  कितने ही संवेदनशील छात्र इस कार्य को करने के लिए आगे बढ़े । यह सब कार्य पूरी तरह संगठित रूप से हुआ । किसी दिन सफाई करने के लिए छात्रों की कमी पड़ गई तो स्वयं भगिनी निवेदिता और स्वामी सदानंद झाड़ू उठा कर रास्ते साफ करने लगे । यह देखकर कुछ छात्र बहुत लज्जित हुए । उन्होंने आगे बढ़कर अपने हाथ में झाड़ू ले लिया ।

कोलकाता के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ.  राधा गोविंदा कर ने भगिनी निवेदिता को इस तरह धूलधूसरित माहौल में कार्य करते देखा तो रोमांचित हो उठे । भगिनी निवेदिता ने न केवल सफाई अभियान का नेतृत्व किया अपितु एक प्लेगपीड़ित अनाथ बच्चे की सेवा करने के लिए उसकी झोपड़ी में उसकी माँ बनकर उसके संग रहीं ।  उन्होंने अपनी एक सखी मिस कूलस्टन को एक पत्र लिखा और कहा कि यहाँ बहुत सारा कार्य है । केवल यहाँ रहना ही अपने आप में एक कार्य है। लगातार एक माह तक रामकृष्ण मिशन के स्वयंसेवकों ने महामारी से राहत पहुँचाने का प्रशंसनीय कार्य किया ।

सबसे प्रेरक बात तो यह है कि विवेकानंद ने कोलकाता के अनेक अंचलों में सेवा- केंद्र खोलते हुए प्लेगपीड़ितों को खुला निमंत्रण दिया  । कहा -- "भाइयो ! अगर आपकी मदद करने वाला कोई नहीं है तो बेलूर मठ में भगवान रामकृष्ण मिशन के शिष्यों को तुरंत सूचना दीजिए । शारीरिक रूप से संभव हर मदद करने में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी ।

इस पर उनके एक गुरु भाई ने प्रश्न किया -- "स्वामी जी, इसके लिए धन कहाँ से आएगा ?"

 

 


स्वामी जी ने जो उत्तर दिया, वह और भी मार्मिक है । कहा --"हम तो संन्यासी हैं । हम तो रूखा-सूखा खाकर पेड़ के नीचे भी रह लेंगे । आवश्यकता पड़ने पर अपने मठ को बेचकर करोड़ों प्लेगपीड़ितों की जान बचाई जा सके तो वह भी मुझे स्वीकार है । परंतु ईश्वर की कृपा से मठ बेचने की नौबत नहीं आई और ईश्वरीय कार्य ईश्वर की योजना से ही संपन्न हो गया ।

ऐसे सेवाधर्मी और समर्पित विवेकानंद और उनके शिष्यों को शत शत प्रणाम !!

 

28th March 2020

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